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Explainer: क्या था वाजपेयी सरकार में विनिवेश ‘घोटाला’, जिसकी अब फिर होने लगी चर्चा

Written by Yuvraj vyas

ऋवेश (विनिवेश) के तहत सरकारी होटल को कौड़ियों के भाव बेचने के एक मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शुमारी सहित पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया है। एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने ऋवेश कार्यक्रम को जोरशोर से आगे बढ़ाया था, लेकिन इस पर घपलों और घोटालों के तमाम आरोप लगे। आइए जानते हैं कि क्या होता है अनवेश और वाजपेयी सरकार पर आरोप क्यों लगते हैं?

क्या होता है वीरेश

ऋवेश मूल रूप से किसी कंपनी में निवेश की उलटी प्रकिया होती है। जब कोई व्यवसाय या उद्योग में सरकार या कोई कंपनी पैसा लगाती है तो उसे निवेश कहते हैं। लेकिन जब कोई कारोबार से सरकार या कंपनी अपना हिस्सा बेचकर पैसा निकालती है तो उसे अनवेश कहते हैं।

ऋवेश प्रक्रिया के जरिए सरकार अपने हिस्से किसी और को बेचकर संबंधित कंपनी से बाहर निकल जाती है और इस तरह से हासिल रकम का इस्तेमाल दूसरी योजनाओं में किया जाता है। अब हर साल सरकार अनवेश के बड़े लक्ष्य रखती है। जैसे इस साल ही सरकार ने ऋवेश से 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा प्रोत्साहन का लक्ष्य रखा है। ऋवेश या तो किसी निजी कंपनी के हाथ किया जा सकता है या फिर उनके शेयर सार्वजनिक में जारी किए जा सकते हैं।

तर्क क्या हैं
ऋवेश के समर्थक यह तर्क देते हैं कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं, देश चलाना है इसलिए सरकार को अलग-अलग कंपनियों से वीेश्वर द्वारा अलग-अलग हटो चाहिए। व्यापार में सरकार की भूमिका कम से कम होनी चाहिए। उदाहरण के लिए सरकार घड़ी, स्कूटर और ब्रेड क्यों बनाए रखते हैं? ऐसी कंपनियों पर सरकारी धन क्यों खर्च होता है? इन पैसों को विकास कार्य में लगाया जाएगा।

निजीकरण और वीवेश में अंतर होता है

यह बात समझ में आएगी कि किसी कंपनी के निजीकरण और वीवेश में अंतर होता है। निजीकरण में सरकार अपनी हावी यानी 51 फीसदी हिस्सा निजी क्षेत्र को बेच देती है और उस पर उसका प्रभुत्व खत्म हो जाता है। लेकिन ऋवेश में सरकार अपनी कुछ ही हिस्से बेचती है और कंपनी पर उसका प्रभुत्व बना रहता है।

वाजपेयी सरकार ने दीप

सार्वजनिक कंपनियों के ऋवेश की प्रक्रिया तो मनमोहन सिंह के नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहने के दौरान ही शुरू हो गई थी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे जबरदस्त उछाल दिया। वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में ऋवेश मंत्रालय के तौर पर एक नया मंत्रालय ही बनाया जिसके मंत्री अरुण शुमारी बनाए गए थे। इसके मंत्रालय का काम निजीकरण के प्रस्तावों को फटाफट मंजूरी देना था। इसलिए इसके साथ ही वीवेश (डिसाइन्वेस्टमेंट) के लिए एक काउंटर कमिटी का भी गठन किया गया ताकि इन अनुप्रयोगों को जल्द मंजूरी दी जा सके।

शुरी के मंत्रालय ने वाजपेयी के नेतृत्व में भारत की कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कोर्प लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी। अटल सरकार ने मॉडर्न इंडस्ट्रीज को हिंदुस्तान यूनिलीवर को बेचने का काम किया। निर्णय लिया गया। आईटी फर्म सीएमसी लिमिटेड को बेच दिया गया। कई सरकारी होटल बेकार हो गए।

क्या विवाद है

भारत में वीवेश प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। मूल रूप से घोटालों की काफी गुंजाइश रहती है। वाजपेयी सरकार के दौरान किए गए कई ऋवेश में भी घपलों और घोटालों के जबरदस्त आरोप लगे, जिनकी अभी तक जांच चल रही है। वाजपेयी सरकार को इसके लिए तीखे विरोध का भी सामना करना पड़ा। बाल्को के निजीकरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वाजपेयी जी के फैसले को बरकरार रखा।

होटलों की बिक्री पर सबसे ज्यादा विवाद

सबसे ज्यादा विवाद कई फाइव स्टार होटल कौड़ियों के भाव बेचने को लेकर। वाजपेयी सरकार ने कई सरकारी होटल को निजी क्षेत्र को दे दिया। इनमें नई दिल्ली में स्थित रंजीत होटल, कुतब होटल और होटल कनिष्क, कोवलम अशोक बीच रिजॉर्ट, कोलकाता का होटल टर्मिनल अशोक और उदयपुर का लक्ष्मी विलास होटल शामिल था। नई दिल्ली का रंजीत होटल बहुत कम कीमत में अनिल अंबानी समूह को बेच दिया गया।

ऐसे ही एक मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शुमारी सहित पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया है। वर्ष 2002 में जब केंद्रीय ऋवेश मंत्री के रूप में अरुण शुरी कार्यरत थे तब उनके मंत्रालय ने उदयपुर के लक्ष्मी विलास होटल को महज साढ़े सात करोड़ रुपए में ललित ग्रुप को दे दिया था। यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान सीबीआई से इस मामले की जांच शुरू करवाई थी। डेवलपर में सामने आया कि इस होटल की कीमत 252 करोड़ रुपये से बहुत अधिक है।

मुंबई के हवाई अड््डे के पास स्थित सेंटोर होटल को साल 2002 में वाजपेयी सरकार ने बेच दिया। इस होटल को 115 करोड़ रुपए में बत्रा हॉस्पिटैलिटी ने खरीदा था। उन्होंने चार महीने के भीतर ही इसे प्रो समूह को 147 करोड़ रुपये के कम कर दिया। यानी इतने कम समय में उन्होंने 32 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा लिया।

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