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नील विद्रोह: जब भारतीय किसानों के आगे ब्रिटिश हुकूमत ने घुटने टेक दिए!

Written by Yuvraj vyas

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई आन्दोलन हुए. उन्हीं आन्दोलनों में भारत के गरीब किसानों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन किया था.

जिसे इतिहास में ‘नील विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है.

किसानों द्वारा किया गया यह विद्रोह सफल भी हुआ था. इनकी संगठित शक्तिशाली बल के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना भी पड़ा था. ऐसे में हमारे लिए इस विद्रोह के बारे में जानना दिलचस्प रहेगा.

तो आइये करीब से जानते हैं नील विद्रोह से जुड़े रोचक किस्सों के बारे में…

भारतीय नील के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने छोड़ी नौकरियां
अंग्रेजों का भारत में आने का पहला मकसद अपने उपनिवेशवाद को बढ़ावा देना था. उनमें यहां विभिन्न प्रकार की खेती भी शामिल थी. वे यूरोप की ज़रूरतों के हिसाब से भारतीय किसानों को उसकी खेती के लिए मजबूर करते थे.

18वीं शताब्दी के अंत तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने अफीम व नील की खेती पर जोर देना शुरू कर दिया. ब्रिटेन में नील का प्रयोग छपाई आदि में किया जाता था.

जैसे-जैसे नील की मांग बढ़ने लगी कंपनी भारत में नील की खेती बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने लगी. बंगाल के साथ बिहार में भी नील की खेती तेजी से फैलने लगी थी. भारत की नील दुनिया भर के बाज़ारों में छा चुकी थी. खासकर भारत के बंगाल की नील में जो उच्च गुणवत्ता थी वो किसी और देश के नील में नहीं थी.

साल 1788 तक ब्रिटेन के द्वारा आयात की जाने वाली नील में भारतीय नील का हिस्सा महज 30 प्रतिशत था. वहीँ 1810 के आसपास ब्रिटेन के द्वारा आयात की जाने वाली नील में भारतीय नील का हिस्सा 95 प्रतिशत बढ़ गया था.

नील के बढ़ते व्यापार को देखते हुए कंपनी के अधिकारी व व्यावसायिक एजेंट नील के उत्पादन पर अधिक पैसे लगाने लगे थे. एक समय ऐसा भी आया जब नील के बिजनेस की खातिर बहुत सारे ब्रिटिश अधिकारियों ने अपनी नौकरियां छोड़ दीं. उन्होंने पट्टे पर जमीनें ले ली और खुद नील के बगान लगाये.

इसके लिए ब्रिटिश सरकार को इनका समर्थन भी प्राप्त था. जिनके पास नील की पैदावार के लिए पैसे नहीं होते थे. उन्हें कंपनी व बैंक कर्जा भी देने को तैयार थे.

अंग्रेजों को अपने नील के बगान में खेती के लिए भारतीय किसानों के साथ मजदूरों की भी आवश्यकता थी. ऐसे में अंग्रेजों ने दो तरीके से नील की खेती करनी शुरू कर दी. पहला बगान मालिक खुद अपनी ज़मीनो में मजदूर लगाकर नील का उत्पादन करते. इसके लिए ज़मीदारों को अपनी ज़मीन मजबूरन लीज पर देनी पड़ती थी.

दूसरा बागान मालिक रैयतों के साथ समझौता करते. इसके लिए वो अनुबंध पर किसानों के दस्तखत कराते. फिर उन किसानों को नील उगाने के लिए कम ब्याज दर पर नकद कर्जा मिल जाता था. इन कर्जा लेने वाले रैयतों को अपनी ज़मीन के 25 प्रतिशत भाग पर नील की खेती करनी पड़ती थी.

बागान मालिक बीज वगैरह का इन्तज़ाम कर देते, मगर किसानों को मिट्टी तैयार करने, बीज बोने से लेकर उसकी देखभाल सब करना पड़ता.

जब कटाई के बाद फसल को बागान मालिक के हाथों सुपुर्द कर दिया जाता तो दोबारा वही चक्र कर्जा इत्यादि का शुरू हो जाता. इससे किसानों को बड़ी परेशानी होती थी. उनके सामने एक मजबूरी ये भी थी कि जिस वक़्त नील की खेती होती थी. उसी वक़्त धान की भी खेती होती थी. ऐसे में बागान मालिकों को मजदूर मिलने में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.

एक समय ऐसा आया जब नील उत्पादन के लिए किसानों को मारा पीटा जाने लगा. उनसे जबरदस्ती नील की खेती कराई जाती. वे हमेशा कर्जों तले दबे रहते.

किसानों को उनके सबसे उपजाऊ जमीन पर नील की खेती करनी पड़ती, मगर नील की खेती के साथ एक ये भी परेशानी थी कि उसकी जड़े बहुत गहरी होती थीं. वह मिट्टी की सारी ताकत खींच लेती. इसकी वजह से नील की कटाई के बाद वहां धान की खेती नहीं की जा सकती थी.

इन सभी परेशानियों को देखते हुए बंगाल के किसान अंग्रेजी हुकूमत से बगावत करने का दमखम भरने लगे.

फिर शुरू हुआ नील विद्रोह
1859 में बंगाल के हज़ारों रैयतों ने नील की खेती से इंकार कर दिया. सबसे पहले इस विद्रोह की शुरुआत सितंबर 1858 में बंगाल के नदिया जिले के गोविंदपुर गांव से हुई थी. जिसका नेतृत्व वहां के स्थानीय नेता दिगम्बर विश्वास और विष्णु विश्वास ने किया था.

इनकी अगुवाई में वहां किसानों ने नील की खेती करने से मना कर दिया. देखते ही देखते यह विद्रोह 1860 तक बंगाल के मालदा, ढाका, पावना जैसे कई क्षेत्रों में फ़ैल गया. 1860 तक इस विद्रोह ने पूरे बंगाल में भूचाल ला दिया था.

किसानों की एकजुटता से इस विद्रोह को बहुत बल मिला. जैसे-जैसे विद्रोह बढ़ता गया रैयतों ने बागान मालिकों को लगान चुकाने से भी इंकार कर दिया. किसान यहीं नहीं रुके कल तक खेतों में चलने वाले हथियार नील की फैक्ट्रियों पर हमले के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा. पुरुषों के साथ महिलाएं भी इस विद्रोह में कूद पड़ी थीं.

बागान मालिकों के लिए काम-काजी वर्गों ने भी सामाजिक बहिष्कार कर दिया. जब कोई एजेंट लगान वसूलने जाता तो उनको पीट कर भगा दिया जाता.

किसानों ने कसम खाली कि न वो नील की खेती करेंगे और न ही बागान मालिकों की खौफ से चुप बैठेंगे. इनकी विद्रोह को तब और बल मिल गया जब वहां के मजबूर ज़मीदारों ने भी इनका समर्थन करने का फैसला किया.

जब डर गई ब्रिटिश सरकार
नील किसानों ने विद्रोह को लगातार जारी रखा. उनको इस बात का अंदेशा हो चुका था कि ब्रिटिश हुकूमत इनके संघर्षों में उनका साथ देगी.इसके पीछे एक वजह ये थी कि 1857 की क्रान्ति के बाद ब्रिटिश अधिकारी बिलकुल सचेत हो चुके थे. वे किसी भी तरह के आंदोलनों में ढिलाई नहीं बरतना चाहते थे.

ऐसे में ब्रिटिश हुकूमत को भारतीय किसानों के इस बढ़ते नील आंदोलन से डर लगने लगा. वो किसी भी प्रकार से इस विद्रोह को शांत करवाना चाहते थे.

कहा जाता है कि किसानों की एकजुटता ने वो काम कर दिया था कि ठण्ड रातों में अधिकारियों को जगह-जगह दौरा करना पड़ता था.

आगे मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया कि रैयतों को नील के अनुबंध मानने पर मजबूर नहीं किया जायेगा. इस घोषणा के बाद लोगों में यह खबर फ़ैल गई कि रानी विक्टोरिया ने नील की खेती न करने का फरमान जारी किया है. स्थिति और बिगड़ने लगी थी.

हुकूमत ने लिया कड़ा फैसला और…
जैसे-जैसे विद्रोह उग्र होता गया. कलकत्ता के एजुकेटेड लोग भी इन गरीब किसानों का साथ देने लगे. पत्रकारों व लेखकों का समूह इन नील वाले शहरों की तरफ जाने लगा. बागान मालिकों के द्वारा किसानों पर किये जा रहे अत्याचार को लेखक खुले तौर पर लिखने लगे.

मामला इतना बिगड़ चुका था कि बागान मालिकों की रक्षा के लिए सेना तैनात करनी पड़ी. आगे इस मामले की जाँच करने के लिए एक नील आयोग का गठन किया गया. इस आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया. उनके बुरे बर्ताव की आलोचना भी की.

साथ ही आयोग ने ये भी कहा कि रैयतों वाले किसानों के लिए नील की खेती घाटे का सौदा है. पिछले अनुबंधों को पूरा करने के बाद किसान बागान मालिकों के लिए नील नहीं उगाएगा. वो उसकी मर्जी पर डिपेंड करता है.

इस बगावत में हुए फैसले के बाद बंगाल में नील का उत्पादन धाराशाही हो गया. अंग्रेज़ बिहार किसानों की तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया. वहां के भी किसानों को उसी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा था.

ऐसे में एक किसान महात्मा गाँधी से मिला. वो उनसे बिहार के नील किसानों की दुर्दशा देखने को संज्ञान में लेने को कहा. इसी के बाद ही 1917 में महात्मा गाँधी ने नील बागानों के खिलाफ चंपारण आंदोलन की शुरुआत की थी.

तो ये थी भारतीय किसानों द्वारा अग्रेजों के खिलाफ नील विद्रोह की दिलचस्प कहानी जिसमें किसानों की एकजुटता की वजह से ब्रिटिश हुकुमत को भी झुकना पड़ा था. शायद इसीलिए नील विद्रोह का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है.

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