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सरकार के पास नहीं, तो फिर कहां है जयगढ़ किले का खजाना?

नाना साहेब पेशवा के खजाने और बिहार की सोन गुफाओं के बाद आज हम इस खजाने का जिक्र कर रहे हैं, उसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है. चूंकि इस खजाने के पीछे अंग्रेज ही नहीं, बल्कि भारत सरकार ने भी अपना काफी पसीना बहाया था. यह बात और है कि बाकी सभी खजानों की खोज की तरह सरकार के हाथ भी खाली ही रहे!

पर यह तथ्य भी आज तक संदेशस्पद है.

रहस्यमयी खजानों की कड़ी में आज हम बात कर रहे हैं राजस्थान के जयगढ़ किले के खजाने की. खजाना था राजा मान सिंह का. वही मान सिंह जो बादशाह अकबर के बेहद अजीज थे. उन्होंने ने ही बीरबल की मौत का बदला भी लिया था.

वैसे तो राजा मान सिंह के अकबरी दरबार से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं, पर जो सबसे दिलचस्प है वह है उनका जयगढ़ किला और उस किले में दबा खजाना.

तो चलिए आज इसी खजाने की खोज पर चलते हैं और जानते हैं उसके राज!

मान सिंह ने ऐसे जमा किया था खजाना
अकबर के नौ रत्नों के बारे में यदि सुना है, तो राजा मान सिंह को आसानी से पहचाना जा सकता है. ये अपनी बुद्धिमत्ता और सैन्य कुशलता के कारण अकबर के दिल के काफी करीब थे. उन्हें प्यार से ‘राजा मिर्जा’ भी कहा जाता था.

बतौर सेनापति मान सिंह ने अकबर के लिए कई ऐतिहासिक जंग जीती थीं.

मुगलों की आदत रही कि उन्होंने ​देश के जिस भी राज्य या रियासत पर हमला किया और जीत हासिल की उसे लूट लिया. चूंकि जीत में मानसिंह का श्रेय भी कम नहीं था, इसलिए संपत्ति में भी उसका बराबर का अधिकार रहा.

मान सिंह से पहले उनके पिता राजा भगवानदास ने भी अकबर के लिए गुजरात युद्ध में मुख्य भूमिका अदा की थी.

मान सिंह पारिवारिक रूप से पहले ही सक्षम थे. उनका जन्म 1540 में हुआ था और वे अम्बेर रियासत के राजा थे. मुगल बादशाह से दोस्ती के बाद उनका कद समस्त भारत में बढ़ गया. हल्दीघाटी के युद्ध में तो उन्होंने महाराणा प्रताप की सेना को परस्त कर शानदार विजय हासिल की थी.

हालांकि, जब मुगलों ने महाराणा प्रताप के राज्य को लूटने की तैयारी की तो मान सिंह ने इसका विरोध किया.

वैसे बादशाह अकबर से मान सिंह का दूसरा रिश्ता फूफा और भतीजे का भी था. 1594 में मान सिंह को बंगाल, उड़ीसा और बिहार का शासक नियुक्त किया गया. इस दौरान उन्होंने कई छोटी बडी रियासतों के राजाओं को हराकर उनकी संपत्ति अपने नाम की. सालों तक मान सिंह ने अपने पराक्रम के बल पर अकूत संपत्ति जमा कर ली थी.

जिसे उन्होंने अपने आमेर किले में गुप्त स्थान पर छिपाया था. उन्होंने अपने जीवन काल में भारत में जितनी भी रियासतों से संपत्ति हासिल की थी, उससे कई गुना सिर्फ एक बार में अफगानिस्तान से हासिल कर ली.

एक कहानी के अनुसार अकबर के आदेश पर मानसिंह काबुल गए थे. वहां की आवाम लुटेरे सरदारों से काफी परेशान थी. मान सिंह ने सरदारों से मुकाबला कर उन्हें जंग में हरा दिया. इसी दौरान मान सिंह ने युसुफजई कबीले के सरदार को मारकर बीरबल की मौत का बदला भी लिया. कहा जाता है कि लुटेरों के पास ​कई टन सोना था, जिसे मानसिंह अपने साथ ले आए थे.

यह सम्पत्ति उन्होंने मुगलों को न सौंपकर आमेर किले में छिपाई थी.

मानसिंह के खजाने के बारे में उस दौर में तो कोई चर्चा नहीं हुई, पर इसका जिक्र अरबी भाषा की एक पुरानी किताब हफ्त तिलिस्मत-ए-अंबेरी (अंबेर के सात खजाने) में मिलता है. इसमें लिखा है कि मानसिंह ने अफगानिस्तान से इतनी संपत्ति लूटी थी कि उससे कई रियासतों को पेट पल सकता था.

किताब में कहा गया है कि जयगढ़ किले के नीचे पानी की सात विशालकाय टंकियां बनी हैं. मान सिंह ने खजाना यहीं छिपाया था.

बातें किताबी थीं, सो किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया. अफवाहें जब तब आती और जाती रही, लेकिन यहां बात अकूत संपत्ति की ​थी, तो भला कितने दिन छिपती. इस खजाने की चर्चा पहली बार 1976 में हुई.

उस वक्त जयपुर राजघराने की प्रतिनिधि महारानी गायत्री देवी थीं. गायत्री देवी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सख्त विरोधी थीं और वे स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनावों में तीन बार कांग्रेस प्रतिनिधियों को हरा का मुंह दिखा चुकी थीं.

कहा जाता है कि गायत्री देवी और इंदिरा गांधी में काफी लंबे समय से ठनी थी. 1975 में इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी. यह सरकार की मनमानी का मौका था. जो केन्द्र सरकार के आदेश पर गायत्री देवी को जेल में डाल दिया गया.

उन पर मीसा के तहत नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा कानून उल्लंघन का आरोप लगाया गया था. इस आरोप के बाद इंदिरा गांधी के आदेश पर जयगढ़ किले में आयकर अधिकारियों ने छापा मारा. इस काम में सेना और पुलिस की भी मदद ली गई.

तीन महीने तक जयगढ़ किले में खजाने की खोज जारी रही. हालांकि गायत्री देवी बार-बार यही दावा करती रहीं कि किले में कोई संपत्ति नहीं है पर सरकार ने संपत्ति के लिए किले को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया.

यह बात और है कि खुदाई खत्म होने के बाद सरकार ने दावा किया कि महल में कोई खजाना नहीं है.

सोचने वाली बात यह है कि जयगढ़ किले से जयपुर की महारानी का क्या संबंध हो सकता है! तत्कालीन दस्तावेजों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि राजा जयसिंह (द्वितीय) ने 1726 में जयगढ़ किले का निर्माण करवाया था.

पर इस महल में बनाई गई सुरंग का दूसरा हिस्सा मानसिंह के 1592 में बनवाए गए आमेर किले में खुलता था. यानि आमेर का किला और जयगढ़ किला आपस में जुड़े हुए थे. इसलिए सरकार ने खुदाई तो जयगढ़ किले में करवाई पर उसके रास्ते वे आमेर किले तक बनी सुरंग में दबे सोने को तलाश रही थी.

बहरहाल भारत सरकार का यह खुफिया अभियान पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से न छिप सका. अगस्त, 1976 में पाकिस्तान के तत्कालीन वजीर-ए-आजम ने इंदिरा गांधी को खत लिखा.

इसमें कहा गया कि, आपके यहां खजाने की खोज का काम आगे बढ़ रहा है और मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि आप इस दौरान मिली संपत्ति के वाजिब हिस्से पर पाकिस्तान के दावे का खयाल रखेंगी.”

जैसे ही यह खत भारत पहुंचा तो खबरें मीडिया के हाथ लगी और यह मसला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया. खुदाई चल ही रही थी और भारत से दुनिया भर के राजनेताओं ने खजाने के बारे में पूछताछ शुरू कर दी.

आखिरकार तीन माह बाद इंदिरा गांधी ने खजाना न मिलने की घोषणा कर दी. और पाकिस्तान को जवाब लिखा. ”हमने अपने कानूनी सलाहकारों से कहा था कि वे आपके द्वारा पाकिस्तान की तरफ से किए गए दावे का ध्यान से अध्ययन करें. उनका साफ-साफ कहना है कि इस दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है. वैसे यहां खजाने जैसा कुछ नहीं मिला.”

सरकार ने भले ही खजाना न मिलने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया हो, पर यह बात लोगों के गले नहीं उतरी. कहा जाता है कि जिस दिन आयकर विभाग और सेना ने किले की खुदाई का काम बंद किया और अभियान खत्म होने की घोषणा हुई. उसके ठीक एक दिन बाद अचानक बिना किसी कारण के दिल्ली-जयपुर हाईवे आम लोगों के बंद कर दिया गया.

माना जाता है कि सरकार को किले से संपत्ति बरामद हुई थी और उसे ट्रकों में भरकर दिल्ली लाया गया था. ​चूंकि सरकार जनता को इसी भनक नहीं लगने देना चाहती थी इसलिए हाईवे बंद कर दिया गया. हाईवे बंद होने की घटना पर कांग्रेस ने कभी कोई सफाई पेश नहीं की. राजघराने के कई सदस्य हैं, जो सरकार के दावे पर विश्वास नहीं करते.

कहा जाता है कि 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद जयपुर राजघराने को किले से बरामद संपत्ति का कुछ हिस्सा लौटाया गया था. हालांकि सच आपतकाल की भेंट चढ़ गया. अपनी साख बचाने के लिए सरकार ने कहा कि किले में खजाना था ही नहीं. इतिहासकारों के मुंह से कहलवाया कि खजाना था, पर उसका इस्तेमाल रियासतों ने जयपुर और आसपास के क्षेत्रों के विकास के लिए कर लिया था. इन सभी दावों के बीच सच का पता आज तक नहीं चल पाया.

जयगढ़ कहें चाहे आमेर का किला, खजाना जहां भी था कम से कम अब वह वहां तो नहीं है. इसकी कहानी भी लंदन में चल रहे ‘हैदराबाद फंड’ के कानून विवाद की तरह ही है. जिसके बारे में हम अपनी अगली कड़ी में बताएंगे.

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Yuvraj vyas

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