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यूरिया की खरीद पर लिमिट क्यों लगाना चाहती है सरकार, सब्सिडी का क्या है गणित?

खबर है कि सरकार अब किसानों के लिए यूरिया खाद खरीदने की सीमा तय कर सकती है। ऐसा करने के पीछे क्या मजबूरी है? नीम कोटेड यूरिया, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) योजना से क्या हुआ? यूरियाज़र परत्य का गणित क्या है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं कि …

मोदी सरकार सब्सिडी वाले यूरिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए लगातार कदम उठा रही है। पहले नीम कोटिंग को अनिवार्य किया गया, फिर पॉइंट ऑफ सेल (POS) मशीनों से बिक्री के बाद ही कंपनियों को सब्सिडी देने यानी रीइम्बर्स करने की व्यवस्था की गई और अब बोरियों की बिक्री सीमा कम से कम करने की बात की जा रही है।

अभी जो सिस्टम है उसमें कंपनियां सब्सिडाइज्ड कीमत पर यूरिया किसानों को देती हैं और बाद में सरकार स ब्सिडी के द्वारा उनके नुकसान की भरपाई करती हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार सरकार किसी भी मौसम में किसान कैसे बोरी सब्सिडी वाली यूरिया खरीदे सरकार इस पर एक सीमा लगा सकती है यानी सीमा तय कर सकती है।

यह तब है जब वर्ष 2018 से ही कंपनियों को सही इस शर्त पर दी जा रही है कि यह किसानों को मूल बिक्री होनी चाहिए और यह बिक्री सेल ऑफ सेल मशीन पर दर्ज होनी चाहिए।

50 बोरी की सीमा!

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक 11 अगस्त, 2020 से अब यह सीमा तय की गई है कि कोई भी व्यक्ति 100 बोरी से ज्यादा शराबी न ले पाया। पहले यह सीमा 200 बोरियों की थी। लेकिन यह 100 बोरी कोई किसान एक साल में बहुत बार ले सकता है, इसकी कोई सीमा नहीं थी। आगे चलकर सरकार एक बार में 50 बोरी और सीजन में कुल खरीदे जाने वाली बोरियों की सीमा भी तय कर सकती है।

मूल रूप से रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने पीटो से हासिल आंकड़ों से अनुमान लगाया है कि कोई धान या गेहूं का किसान प्रति एकड़ खेत में तीन बोरी यूरिया, एक बोरी डाई अमोनियम सल्फेट और आधा बोरी पोटाश म्यूरेट का इस्तेमाल करता है। इस तरह 100 बोरी यूरिया 20 एकड़ जमीन के किसान के लिए एक सीजन में काफी है।

अधिकारियों का कहना है कि इससे पहले ग्राहकों से सब्सिडाइज्ड यूरिया जिला मुख्यालयों तक पहुंचता ही नहीं थी और कहीं और खाप थी। पीएम मोदी ने इस पर अंकुश के लिए नीम कोटिंग यूरिया का भी प्रावधान किया जिसे मोदी सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि बताती रही है।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पहले यूरिया के कारखाने से निकलने से लेकर उसके खुदरा दुकानदार तक पहुंचने तक भी लीकेज हो सकती थी, अर्थात सब्सिडी वाली यूरिया की बोरी किसान को न एक साथ कहीं और जा सकती थी। अब ऐसा ऐसा लीकेज सिर्फ 2.26 लाख पीओ वाले फ्लिप दुकानदारों से ही हो सकता है। लेकिन अब सरकार इस पर भी अंकुश लगाने की तैयारी कर रही है और इस बात की हरसंभव व्यवस्था होगी कि सिर्फ मूल जरूरतमंद किसानों को ही तय किए यूरिया दी जाए।

अभी खरीद कैसे होती है

अब किसान से आधार कार्ड, किसान क्रेडिट कार्ड या वोट आईडी कार्ड जैसे पहचान पत्र मांगे जाते हैं। उसका नाम क्या है, वह कितनी मात्रा में खाद खरीद रहा है और उसकी बायोमीट्रिक पहचान, सब कुछ पीय डिवाइस में दर्ज हो जाता है। यह उपकरण मंत्रालय के ‘ई-सलाहकार’ प्लेटफॉर्म से जुड़ी होती है।

नई यूरिया नीति

मोदी सरकार वर्ष 2015 में 25 गैस आधारित परियोजनाओं के लिए नई यूरिया नीति के तहत आई थी। इसका उद्देश्य देश में ही गैस आधारित यूरिया उत्पादन बढ़ाना, यूरिया उत्पादन में एनर्जी के निम्नतम उपयोग को बढ़ाना और सरकार पर सब्सिडी के बोझ को कम करना है।

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Yuvraj vyas

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