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ज्योतिष शास्त्र में वास्तु शास्त्रीय चिन्तन और वैज्ञानिकता

वास्तु शास्त्रकृतनीय समाज में बहुचर्चा का विषय है। जब किसी वस्तु या विषय की चर्चा होती है तो उस वस्तु और विषय को सुधी (ज्ञाननिधि) मानव उसके ज्ञान को जानना चाहता है। क्योंकि मानव एक अन्वेषक प्राणी है। वास्तु अति प्राचीन है जिसका प्रमाण कई पौराणिक ग्रन्थों में प्राप्त होता है। यहाँ एक बात यह जिज्ञासा उत्पन्न कर रही है कि क्या सबकुछ वास्तु सम्मत होने पर मानव के जीवन में सबकुछ अच्छा हो जाएगा? यदि हां, तो हम इतिहास को देखते हैं मयार्दा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामजी की जीवनी से पता चलता है कि रामजी को भी 14 वर्ष का वनवास काटना पड़ा था।

इससे यह प्रश्न स्वतः उठ खड़ा होता है कि- क्या राजा दशरथ का भवन वास्तु सम्मत नहीं था? रावण की स्वर्णमयी लंका मय द्वारा निर्मित और स्वयं दशानन इतने बड़े विद्वान थे फिर भी उनकी स्थिति सर्वविदित है। महाभारत काल को देखें तो पाण्डवों को दर-दर भटकना पड़ा था क्या वहाँ भी वास्तुसम्मत भवन का निर्माण नहीं था। अगर वास्तु विरुद्ध था तो बहुत बडे विद्वान और मार्टिन होते हुए भी इसको ठीक नहीं कर पाए।
यह प्रश्न मन में जिज्ञासा उत्पन्न करता है कि आखिर वास्तुशास्त्र पर इतनी चर्चा क्यों हुई? फिर वास्तुशास्त्र की इतनी बड़ी क्या आवश्यकता है? यह भी सत्य है कि बिना प्रभाव के किसी भी शास्त्र या व्यक्ति को लोग नहीं मानते हैं। वास्तुशास्त्र की मान्यता प्राचीन काल में थी और आज भी लोग मानते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तु का प्रभाव प्रत्येक प्राणी पर प्रभावी है। आज भी है और प्राचीन काल में भी था। अतः उस युग में भी काल ही प्रभावी दृष्टगोचर होता है। उस कालीन लोग भी भगवान् विश्वकर्मा और मय आदि के द्वारा अपने भवन निर्माण किए थे।
इन दोनों तथ्यों को देखते हैं तो बड़ी ही विरोधभास की स्थिति जागृत हो जाती है। मेरी दृष्टि में कालजन्य दबाव नित्य है और उस नित्य को स्वीकार करते हुए जगत के स्वामी लीलाधर की शरण प्राप्त करने के लिए बाहरी प्रकोपों ​​से बचने के लिए लोग गृह निर्माण करते हैं जिससे घर के अन्तर्गत उन देवों के निवास स्थान के साथ-साथ अपना मन, कर्म। और वचन पर संयम रखने के लिए घर में रहकर उनकी उपासना का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए और प्राचीन काल में भी प्रमुख उद्देश्य यही है। परब्रह्म का वास्तुशिल्प निर्माण है यथा-
ग्रहर्क्ष-देव-दैत्यादि सजातो स स चराचरम्।
कृताद्रिवेदा दिव्याब्दा: शतघ्ना वेधसो गताः।।1 ।।

इस सृष्टि को आगे चलाने का कार्यभार सबको है और ज्योतिष शास्त्र कालात्मकशास्त्र है। संसार के प्रत्येक प्राणी का शुभ-अशुभ फल कालाहीन है जो नित्य है। परमब्रह्म ने जगत् की सृष्टि के लिए अहंकाररूपी ब्रह्मा को बनाया। इसके बाद सब लोकों के पितामह ब्रह्मा को श्रेष्ठ वेदों को देकर और उन्हें अण्डे के बीच स्थापित करके अनिरुद्ध भगवान स्वयं लोकों को प्रकाशित करते हुए भ्रमण करते हैं। इसके पश्चाताप अहंकार मूर्तिधरी ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने का विचार किया। ब्रह्मा के मन से चन्द्रमा और नेत्रों से तेजपुंज सूर्य उत्पन्न हुए।

1 सू.भू.आश्लो। 24
मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी पाँच महाभूत क्रम से एक-एक गुण की वृद्धि से उत्पन्न हुए। यथा-
अथ शक्त्यं मनश्चक्रे ब्रह्मा स हंकारमूर्तिभृत्।
मनश्चेन्द्रमा जज्ञे सूर्यो स कृष्णस्तेजसँ निधि: ।।
मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात्।
गुणकवृद्ध्य पछेति महाभूतनिक जोगिरे।।2 ।।

अग्निमय सूर्य और सोम स्वरूप चन्द्रमा की उत्पत्ति के बाद तेज अर्थात् अग्नि से मंगल, पृथ्वी से बुध, आकाश से बृहस्पति, जल से शुक्र और वायु से शनि उत्पन्न हुए। यथा-
अग्निषोमौ भानुचन्द्रौ ततस्त्वगार दुर्गकादयः।
तेजोभूखाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे।।३ ।।

इसके पश्चाताप परमात्मा ने श्रेष्ठ, मध्यम और अधर्म स्रोतों से सत्व, रज और तम विभेदात्मक प्रकृति का निर्माण करके देवता, मनुष्य, राक्षस आदि चराचर विश्व की रचना की। यथा-
ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवत्युम्।
अप्वमध्याधरेभ्यो स सन्त स्त्रोतोभ्यः प्रकृतीः सजनः।
गुणकर्मविभागेन शरतवा प्राग्वदनुक्रमात्।
विभागं कल्पमयमास यथास्वं वेददर्शनात् ।।
ग्रहनक्षत्रतारनं भूमेर्विश्वस्य वा विभुः।
देवासुरमनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम्।।4 ।।

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Yuvraj vyas

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